लिटन दास ने पाकिस्तान के खिलाफ अपनी शानदार टेस्ट शतकीय पारी के पीछे की मानसिकता का खुलासा किया
सिलहट टेस्ट में लिटन दास का जुझारूपन
टेस्ट क्रिकेट में अक्सर ऐसा समय आता है जब टीम का शीर्ष क्रम बिखर जाता है और जिम्मेदारी निचले क्रम के बल्लेबाजों पर आ जाती है। सिलहट टेस्ट में कुछ ऐसी ही स्थिति का सामना बांग्लादेश को करना पड़ा, लेकिन लिटन दास ने अपनी शानदार बल्लेबाजी से न केवल स्थिति को संभाला, बल्कि एक यादगार शतक भी जड़ा। जब टीम का स्कोर 126 रन पर 6 विकेट था, तब ऐसा लग रहा था कि बांग्लादेश बड़ी मुसीबत में है, लेकिन लिटन दास की 126 रनों की नाबाद पारी ने पूरे मैच का रुख पलट दिया।
पुछल्ले बल्लेबाजों का अमूल्य सहयोग
लिटन दास ने अपनी इस पारी का श्रेय ताइजुल इस्लाम, तस्कीन अहमद और शोरिफुल इस्लाम को दिया। उन्होंने कहा कि पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ बल्लेबाजी करना शीर्ष क्रम के बल्लेबाजों के साथ बल्लेबाजी करने से बिल्कुल अलग होता है। जब आपके साथ अनुभवी बल्लेबाज जैसे मुशफिकुर रहीम या मेहदी हसन मिराज होते हैं, तो सिंगल लेना आसान होता है और आप आश्वस्त रहते हैं। हालांकि, निचले क्रम के बल्लेबाजों के साथ तालमेल बिठाना काफी चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि वे लंबे समय तक पिच पर टिकने में अक्सर संघर्ष करते हैं।
सिलहट में ताइजुल ने 40 गेंदें खेलीं, तस्कीन ने 14 और शोरिफुल ने 30 गेंदों का सामना करके लिटन को एक छोर से भरपूर समर्थन दिया। लिटन ने माना कि अगर ये खिलाड़ी क्रीज पर समय बिताते हैं, तो उनके लिए रन बनाना बहुत आसान हो जाता है।
लिटन की रणनीति: स्ट्राइक को अपने पास रखना
लिटन दास ने साझा किया कि पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ बल्लेबाजी करते समय उनकी मुख्य रणनीति स्ट्राइक को अपने पास रखने की होती है। उन्होंने कहा, ‘हमारी टीम का निचला क्रम अभी इतना मजबूत नहीं है कि मैं उन्हें छह गेंदों का सामना करने के लिए छोड़ सकूं। मुझे याद है एक बार मैंने किसी को स्ट्राइक दी और वे पहली ही गेंद पर आउट हो गए। उस अनुभव के बाद, मैंने तय किया कि मैं उन्हें केवल एक या दो गेंदें ही खेलने दूंगा।’
खासकर जब वे 99 के स्कोर पर थे, तब वे काफी तनाव में थे। उन्होंने शोरिफुल को लगातार आगे बढ़कर खेलने की सलाह दी ताकि वे तेज गेंदबाजों की बाउंसर्स से बच सकें। लिटन का यह धैर्य ही उनकी सफलता का राज रहा।
दबाव में शतक का लक्ष्य नहीं, टीम का लक्ष्य
लिटन ने स्पष्ट किया कि उनका ध्यान शतक बनाने पर नहीं था। उनका एकमात्र लक्ष्य टीम को 200 रनों के पार ले जाना था। उन्होंने बताया कि जब ताइजुल क्रीज पर आए, तब टीम का स्कोर 116 रन था। उन्होंने कहा, ‘आप शतक की योजना नहीं बना सकते। मैं केवल यह देख रहा था कि रन कैसे आएंगे और मैं टीम को एक सम्मानजनक स्कोर तक कैसे पहुंचा सकता हूं।’
रावलपिंडी और श्रीलंका की पारियों से तुलना
लिटन ने अपनी इस पारी की तुलना रावलपिंडी में मेहदी हसन मिराज के साथ खेली गई साझेदारी से की, जहां बांग्लादेश 26 रनों पर 6 विकेट गंवा चुका था। उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ खेली गई अपनी एक अन्य शतकीय पारी को भी याद किया। उन्होंने कहा, ‘श्रीलंका के खिलाफ मेरी मानसिकता अलग थी क्योंकि मुशफिकुर भाई मेरे साथ थे। रावलपिंडी में मिराज साथ थे। लेकिन सिलहट में स्थिति पूरी तरह अलग थी, क्योंकि मुझे बहुत जल्दी पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ साझेदारी शुरू करनी पड़ी थी।’
उनकी यह पारी न केवल तकनीकी कौशल का प्रदर्शन थी, बल्कि मानसिक मजबूती का भी प्रमाण थी। धीमी आउटफील्ड और दबाव के बावजूद, लिटन ने जोखिम उठाए और टीम को एक मजबूत स्थिति में पहुंचाया। यह पारी आने वाले समय में बांग्लादेशी क्रिकेट प्रशंसकों के लिए हमेशा यादगार बनी रहेगी।
